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सोमवार, 28 जनवरी 2013

मासुम कली

मासुम  कली 


जहाँ से चली थी वह अँधेरी गली थी 
दुनिया की अब तो रोशनी दिख चली थी 
माँ के पेट में ही दिन रात ढली थी 
फिर मुझे क्यों मार दिया गया माँ 
माँ मैं तो एक मासुम कली थी 

हर एहसास में तो मैं भी तेरे साथ थी 
तुम्हारे सांसो से ही मेरी साँस थी 
क्या ये सच्चे प्यार की सुरुआत नहीं थी 

फिर मुझे क्यों मार दिया गया माँ 
माँ मैं तो एक मासुम कली थी 


मेरे बिना नहीं तो कटी न थी कोई भी पल
पर तुम्हे भी ना सुनाई दी मेरे जिस्म की हलचल 
पता नहीं वह क्या था तडप रही उससे मैं पल-पल 
पापा को देखने की आस लगाये रोनें लगी थी 

फिर मुझे क्यों मार दिया गया माँ 
माँ मैं तो एक मासुम कली थी 


तडपती रही जूझती रही पर दिल में ही मची खलबली थी
सांसे लेना दूभर हो गया था ऐसी भी क्या किसने क्या चाल चली थी
आखिकार हार गयी जिस्म से मेरें प्राण निकल चली थी 
दुनिया वालों का बेटिओं से ऐसी क्या दुश्मनी रही थी 

मुझे क्यों मार दिया गया माँ , माँ मैं तो एक मासुम कली थी 


मुझे माफ़ करदे माँ तेरा कर्ज उधार रहा मुझपे 
मैं नहीं कोई भी दोष दे रही हूँ तुझपे 
तेरे सांसे तेरे एहसान का मौका मिला तो जरुर चुकाऊँगी
भगवान से जाकें लडकें देना ऐसा प्रार्थना ही जाने के बाद बोल आई हूँ 
दिल पर ना अपने कोई बोझ रखना यही बताने आई थी 
मारा क्यों जाता बेटी को यही जानने वापस आई थी 
.......................................यही जानने आई थी 
.............................यही जानने आई थी ..........................................




                                                                                                      ......वरुण कुमार साह ......

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